एक दिन की शुरुआत

सुबह आँख खोल के फिर मूंद लेता हूँ मैं,
क्या जाने वो सुनेहरा ख्वाब फिर से आ जाए…
थोड़ा अपने खाबों को, तमन्नाओं को और जी लून मैं…
काम तो होता रहेगा हमेशा…क्या ये दुनिया रुक जाएगी मेरे बिना,
तभी एक आवाज़ मुझे जगाती है ‘ उठो, ऑफीस नहीं जाना है क्या’…
फिर से ..बहुत मुश्किल से आँख खोलता हूँ…
छोटे छोटे हाथ और पैर पसारे, मेरा कलेजा मेरे पास सो रहा है…
एकदम से ख्वाब और ख्वाहिशें छू-मंतर हो जाती हैं….
काम तो करना पड़ेगा, हमेशा, वरना ये मेरी दुनिया रुक जाएगी मेरे बिना……

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